विशिष्टता की पहचान – सम्मान

​जहाँ के निवासियों की भाषा-भेषज-भोजन समान नहीं है, ऐसे प्रांत और क्षेत्र राष्ट्र की अखंडता में कोई योगदान नहीं देते|

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संस्कृति रक्षण की दो धाराएं – शास्त्र और शस्त्र

​संस्कृति रक्षण के लिए दोनों अनिवार्य हैं – शास्त्र और शस्त्र परंतु लक्ष्य एक ही है संस्कृति रक्षण । आदमी

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ईशावास्य उपनिषद् – 1:1:1 (Ishavasya Upanishad 1:1:1)

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।   ईशावास्यमिदँ् सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन

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The Critical Philosophy of Immanuel Kant (कांट का समीक्षावाद)

The aim of critical philosophy is to comprehend the nature and limitation of human cognition.    – Immanuel Kant कांट

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प्राणमय कोश की साधना – 6

मुद्रा – विज्ञान मुद्राओं से ध्यान में तथा चित्त को एकाग्र करने में बहुत सहायता मिलती है। इनका प्रभाव शरीर की

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प्राणमय कोश की साधना – 5

तीन बन्ध दस प्राणों को सुसुप्त दशा से उठाकर जागृत करने, उसमें उत्पन्न हुई कुप्रवृत्तियों का निवारण करने, प्राण शक्ति

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प्राणमय कोश की साधना – 4

पांच महाप्राणऔर पांच लघुप्राण   मनुष्य शरीर में दस जाति के प्राणों का निवास है । इनमे से पांच को

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प्राणाकर्षण प्राणायाम

(1) प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर आसन पर बैठिए । दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए।

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प्राणमय कोश की साधना – 3

प्राणाकर्षण  की सुगम क्रियाएँ – 1   प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर साधना के लिए किसी शांतिदायक स्थान पर

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प्राणमय कोश की साधना – 2

प्राणायाम (Pranayam) श्वास को खींचने उसे अंदर रोके रखने और बाहर निकालने की एक विशेष क्रियापद्धति है , इस विधान

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प्राणमय कोश की साधना – 1

प्राणशक्ति का महत्व ‘प्राण’ शक्ति एवँ सामर्थ्य का प्रतीक है | मानव शरीर के बीच जो अंतर् पाया जाता है

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गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश – ४

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन –३. तत्व-शुद्धि    यह श्रृष्टि पंच तत्वों से बनी हुई है | प्राणियों

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गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश – ३

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन — २. आसन ऋषियों ने आसनों को योग साधना मे इसलिए प्रमुख स्थान

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गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश – २

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन –  १. उपवास अन्नमय कोश की अनेक सूक्ष्म विकृतियों का परिवर्तन करने मे

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गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश -१

गायत्री के पांच मुखों मे आत्मा के पांच कोशों मे प्रथम कोश का नाम ‘ अन्नमय कोश’ है | अन्न

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पञ्चकोश-साधना (Panchkosh Sadhna)

पाँच तत्वों से बने इस शरीर में उसके सत्व गुण चेतना के पाँच उभारों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं

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2. The Supreme Truth Consciousness : Concept of Space & Time by Sri Aurobindo

Each thing in Nature, therefore, whether animate or inanimate, mentally self-conscious or not self-conscious, is governed in its being and

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1. The Supreme Truth Consciousness : Concept of Space & Time by Sri Aurobindo

One seated in the sleep of Superconscience, a massed Intelligence, blissful and the enjoyer of Bliss. . . . This is

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अन्न्मय-कोष का प्रवेश द्वार – नाभि चक्र

गर्भाशय में भ्रूण का पोषण माता के शरीर की सामग्री से होता है। आरंभ में भ्रूण, मात्र एक बुलबुले की

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व्याहृतियों में विराट का दर्शन

भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्तमोम्ब्रह्म तेषुहि स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥ -गायत्री स्मृति शास्त्रों का कथन है कि “भू, भुवः

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षोडश कलाओं का विवेचन ( 16 कला )

वाचस्पत्यम् में “कला” शब्द की वयुत्पत्ति इन शब्दों में विवेचित है – कलयति कलते वा कर्तरि अच्, कल्यते ज्ञायते कर्मणि

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