The Critical Philosophy of Immanuel Kant (कांट का समीक्षावाद)

The aim of critical philosophy is to comprehend the nature and limitation of human cognition.    – Immanuel Kant

कांट का दर्शन critical है | उसका criticism विशेष प्रकार का है | कांट बुद्धिवाद के गुणों एवं दोषों को पृथक करता है फिर इन्द्रियानुभववाद के गुणों एवं दोषों को पृथक करता है | वह दोनों के गुणों का मंडन करते हुए उनका समन्वय करता है और दोनों के दोषों का खंडन करता है |
उसका कहना था कि केवल बुद्धिवाद का अंत dogmatism ( स्वमताभिमान, मतांधता, रूढ़िवाद, अंधविश्वास ) में और इन्द्रियानुभववाद का अंत संदेहवाद( scepticism ) में होता है | dogmatism and scepticism का अंत तभी संभव है जब बुद्धिवाद और इन्द्रियानुभववाद में समन्वय हो |इसे ही समीक्षावाद (criticism) कहते हैं |


बुद्धिवादियों के अनुसार बुद्धि ही ज्ञान की जननी है | ज्ञान सार्वभौम (universal) और अनिवार्य (necessary) होता है ऐसे सार्वभौम और अनिवार्य ज्ञान की प्राप्ति इन्द्रियानुभव से नहीं हो सकती है | उदाहरणार्थ दो और दो का योग चार होता है | यह ज्ञान सार्वभौम तथा अनिवार्य है | संसार के सभी देश-काल के लोग दो और दो का योग चार ही स्वीकार करते हैं | सार्वभौम तथा अनिवार्य ज्ञान आत्मा में जन्म से ही अन्तर्निहित होता है | इस प्रकार का सार्वभौम तथा अनिवार्य ज्ञान गणित में पाया जाता है | यह ज्ञान जन्मजात ( A priori ) तथा अनुभव-निरपेक्ष ( independent of experience ) है | बुद्धि नया ज्ञान नहीं उत्पन्न करती बल्कि आत्मा में जन्म से निहित प्रत्ययों को बाहर निकालती है | इसलिए बुद्धिवादी दार्शनिक निगमनात्मक ( deductive ) तर्क प्रणाली को स्वीकार करते हैं | बुद्धि आत्मा में निहित ज्ञान की केवल अभिव्यक्ति करती है | इस अभिव्यक्ति को सिद्ध करने के लिए मकड़ी के जाल का उदाहरण दिया जाता है | मकड़ी का जाल सम्पूर्ण मकड़ी में ही अन्तर्निहित होता है मकड़ी केवल उसे बाहर कर देती है | जाल को बाहर करने में मकड़ी को क्रिया करनी पड़ती है इसीप्रकार बुद्धि भी सक्रीय है जो अपनी रचनात्मक प्रकृति से केवल अन्तर्निहित ज्ञान को बाहर करती है |

अनुभववाद के अनुसार अनुभव ही ज्ञान का जनक है , अर्थात ज्ञान अनुभव-सापेक्ष ( Aposteriori ) है | अनुभववाद के पिता जान लाक (John Locke) ने बुद्धिवाद की सभी मान्यताओं का खंडन किया | उनके अनुसार हमारी बुद्धि में कोई प्रत्यय जन्मजात नहीं होता है जन्म के समय मानव का मन एक सफ़ेद कागज़ के सामान होता है जिसमे संवेदना ( sensation ) तथा स्व-संवेदना ( reflection) नामक दो वातायन से ज्ञान का प्रकाश आता है |

बर्कले (Berkeley) का कहना है की जो प्रत्यक्ष नहीं उसका अस्तित्व भी नहीं , इस आधार पर वह ईश्वर आदि को भी नहीं मानता | To be is to perceived. | कार्यकारण –वाद का भी निषेध ह्यूम ने किया था | उसका कहना था कि कार्यकारण-वाद की अनिवार्यता केवल मान्यता है , हम दो घटनाओं में सम्बन्ध कल्पना के आधार पर ही मान लेते हैं वस्तुतः उनमे कोई सम्बन्ध नहीं है | इस प्रकार अनुभववाद का पर्यवसान संदेहवाद में होने लगता है |

बुद्धि से प्राप्त ज्ञान में objectivity नहीं होती और इन्द्रियानुभव से प्राप्त ज्ञान में निश्चित रूप से objectivity होती है, इन्द्रियानुभव से प्राप्त ज्ञान universal and necessary भी नहीं होता | वैज्ञानिक ज्ञान के लिए ज्ञान का universal , necessary and objective तीनों होना जरूरी है , जो कि बुद्धिवाद और इन्द्रियानुभववाद के समन्वय से ही संभव है |

कांट का कहना है कि ज्ञान इन्द्रियानुभव और बुद्धि दोनों की ही सहायता से मिलता है ज्ञान में दोनों की ही भूमिका है | इसके पूर्व इन्द्रियानुभववादियों और बुद्धिवादियों ने इन्द्रियों का और बुद्धि का ज्ञान प्राप्ति में क्या रोल है , इस पर विचार ही नहीं किया था |बुद्धिवादी दार्शनिकों के अनुसार गणित में अनिवार्य और सार्वभौम ज्ञान की प्राप्ति होती है इसलिए गणित ही आदर्श शास्त्र है | परन्तु गणित के सिद्धांत भी अनुभव की अपेक्षा रखते हैं | गणित में भी यथार्थ घटनाओं के उल्लेख की आवश्यकता है |

कांट अपनी पहली पुस्तक ‘Critique of pure reason’ ( शुद्ध ज्ञान की परीक्षा ) में इन्ही का विचार करता है |

विश्लेषण करने पर हम ज्ञान के दो अंग पाते हैं – उपकरण ( Matter ) और स्वरुप ( Form ) | ज्ञान का उपकरण हमें अनुभव से प्राप्त होता है परन्तु ज्ञान का स्वरुप हमें बुद्धि से प्राप्त होता है | मान लिया जाए कि उपकरण मिटटी है तथा स्वरुप सांचा है , जब मिटटी को सांचे में डालते हैं तभी विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण होता है | इस प्रकार ज्ञान सामग्री और स्वरुप दोनों का सम्मिश्रण है | बुद्धिवादियों का कहना है कि कार्य-कारण , द्रव्य आदि जन्मजात प्रत्ययों के बिना ज्ञान संभव नहीं है तथा अनुभववादियों का कहना है कि बिना संवेदना के सामग्री का ज्ञान संभव नहीं |

कांट प्रश्न करता है …

How is maths possible ?
How is science possible ?

अतः आवश्यक प्रश्न है ..

ज्ञान क्या है ?
ज्ञान का स्वरुप क्या है ?
ज्ञान की सीमा क्या है ? अर्थात हमें किन –किन विषयों का ज्ञान हो सकता है ?

कांट के अनुसार ज्ञान अनुभवनिरपेक्ष निर्णय ( Synthetic a priori Judgement ) है |

हमारे निर्णय ( judgement ) दो प्रकार के होते हैं |

१. विश्लेषणात्मक ( Analytic ) : विश्लेषणात्मक निर्णय में विधेय उद्येश्य का मात्र विश्लेषण करता है | उसके विषय में कुछ नयी बात नहीं बताता | उदाहरणार्थ—‘शरीर विस्तृत होता है’ ‘मनुष्य पशु है’ इन दोनों उदाहरणों में विधेय ‘विस्तृत होता है’ और ‘पशु है’ ये उद्येश्य ‘शरीर’ और ‘मनुष्य’ के विषय में कोई नया ज्ञान नहीं देते वरण विश्लेषण मात्र करते हैं |

२. संश्लेषनात्मक ( Synthetic ) : संश्लेषणात्मक निर्णय में विधेय उद्येश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देते हैं |
उदाहरणार्थ : मंगलवार को पानी बरसा था | जो पढालिखा हो उसे मनुष्य कह जाता है | इन उदाहरणों में विधेय उद्येश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान दे रहे हैं |

निर्णय का उपरोक्त वर्गीकरण, ज्ञान के विषयवस्तु के अनुसार है परन्तु उत्पत्ति की दृष्टि से इसे पुनः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है |

१. अनुभव-निरपेक्ष ( Apriori )
२. अनुभव –सापेक्ष ( Aposteriori )

अनुभव सापेक्ष निर्णय हमारे अनुभवों पर आश्रित होते हैं जबकि अनुभवनिरपेक्ष निर्णय सार्वभौम और अनिवार्य होते हैं | सफ़ेद फूलों में सुगंध होती है इसके लिए हमें सभी सफ़ेद फूलों के विश्लेषण से सुगंध का ज्ञान नहीं हो सकता है हमें सुगंध के अनुभव से गुजरना पड़ता है , इन निर्णयों में अनिवार्यता नहीं होती है |

उपरोक्त दोनों प्रकार के वर्गीकरण को मिलाते हुए , अर्थात ज्ञान की उत्पत्ति और विषयवस्तु दोनों को एकसाथ मिलाकर कांट का कहना है कि संश्लेशनात्मक निर्णय अनुभव सापेक्ष है , तात्पर्य यह है की संश्लेशनात्मक निर्णय की उत्पत्ति हमारे अनुभवों पर निर्भर है , परन्तु इसमें अनिवार्यता नहीं होती है ये निर्णय केवल संभाव्य ( probable ) माने जा सकते हैं | उदाहरनार्थ हम अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकते हैं की सूरज पूरब से निकलता है , परन्तु हम अपने अनुभव के आधार पर यह नहीं कह सकते कि सूरज पूरब से ही उगेगा , तात्पर्य यह है कि इसमें अनिवार्यता नहीं , केवल संभाव्यता है | इसके विपरीत विश्लेषणात्मक वाक्यों में अनिवार्यता होती है | विश्लेषणात्मक निर्णय अनुभव निरपेक्ष , अनिवार्य होते हैं तथा इनसे ज्ञान में वृद्धि नहीं होती है | इसके विपरीत संश्लेशनात्मक निर्णय अनुभव सापेक्ष , संभाव्य और ज्ञान की वृद्धि करने वाले होते हैं |

कांट के अनुसार ज्ञान अनुभव निरपेक्ष संश्लेशनात्मक निर्णय है | तात्पर्य यह है कि अनिवार्यता और नवीनता दोनों ज्ञान के आदर्श हैं | यथार्थ निर्णय ज्ञान की वृद्धि करता है साथ साथ अनिवार्य भी होता है |

कांट के अनुसार, “ज्ञान वह है जो विधानों के स्वरुप में से बाहर आता है , ज्ञान विधानात्मक है | ज्ञान वह है जिसमे universality, necessity and objectivity हो |” विधानों के सम्बन्ध में वह बोलता है कि- synthetic a priori judgement में यह capacity है |

Leave a Reply