विशिष्टता की पहचान – सम्मान

​जहाँ के निवासियों की भाषा-भेषज-भोजन समान नहीं है, ऐसे प्रांत और क्षेत्र राष्ट्र की अखंडता में कोई योगदान नहीं देते| किसी राष्ट्र में यदि इस प्रकार के क्षेत्रों और प्रान्तों का विस्तार होने लगे तो निश्चित ही अलगाव और अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है|

अपने क्षेत्र को छोड़कर असमान क्षेत्र में स्थानांतरण करना भाषा-रीति-संतुलन को हानि तो पहुंचाता ही है, साथ ही साथ, भाषा-रीति-संतुलन और सामाज की स्थिरता को जो और प्रगाढ़ होनी थी, उसे भी रोक देता है| शायद इसलिए हमारे सुभाषितानि में एक जगह कहा गया है कि अतिथि एक समय का भोजन करके लौट जाता है|
आप खुद सोचिए, यदि कोई बंगाली आंध्र प्रदेश में जाकर रहने लगेगा, तो वह न सिर्फ अपनी भाषा से दूर हो जाएगा, बल्कि अपने लौकिक पहनावे और रीति से भी दूर हो जाएगा….
इसलिए हम सभी भारतीय जो मातृभाषा को प्रोत्साहन देने की बात करते हैं, को चाहिए कि हम ये सुनिश्चित करें कि ” शिक्षा और रोजगार के अवसर सभी प्रान्तों में समान हों “, ताकि किसी विशेष प्रांत से जुडी हुई भाषा का तुलनात्मक वर्चस्व न हो (जैसे आज भारतीय भाषाओं की अपेक्षा अंग्रेजी का तुलनात्मक वर्चस्व अधिक है)|
वैसे व्याकरण की दृष्टि से देखें तो हमारे पूर्वजों ने हमारी भाषा में सम्मान शब्द तुलना के लिए प्रयोग नहीं किया है|
थोड़ा ध्यान से देखें :

सम्मान = सम् + मान = सम्यक् मान = विशिष्टता के लिए आदर (जिस विशिष्ट गुण को आप धारण करते हो उसके लिए आपकी कीर्ति हो)

हम संस्कृत में पढते हैं : काक चेष्टा बको ध्यानं श्वान निद्रा ….
हम कौवे का उसके विशिष्ट गुण के लिए आदर करते हैं, बगुले का उसके विशिष्ट गुण के लिए आदर करते हैं, कुकुर का उसके विशिष्ट गुण के लिए करते हैं |
तुलना तो समान गुणों वाली दो वस्तुओं में की जा सकती है | एक घोड़े और दुसरे घोड़े में | भिन्न वस्तुओं में (जो अपने आप में विशिष्ट हैं) तुलना अप्रासंगिक है| ऐसी तुलना अज्ञानी जन ही करते हैं|
By: Sahil Praveen Kakkad Jee.
Chandan Priyadarshi

Chandan Priyadarshi

A student of Spirituality from the ancient city of Nalanda, a Vedantic by faith, an independent philosopher and wanna be philanthropreneur by interest just trying to explore the subtle world of Ancient Philosophy with reference to Modern Science. Having an immense ineterest in Ancient Indian and Vedic Philosophy, Philology, Lexicography, Comparative Religion, Comparative Philosophy, Oriental and Occidental Philosophy, Astrophysics and Astronomy, Ancient and Modern History, Parapsychology, just want to project an integral and synthesized approach of Ancient Philosophy and Modern science to world.

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