संस्कृति रक्षण की दो धाराएं – शास्त्र और शस्त्र

संस्कृति रक्षण के लिए दोनों अनिवार्य हैं – शास्त्र और शस्त्र

परंतु लक्ष्य एक ही है संस्कृति रक्षण । आदमी को बदलकर । व्यक्ति के विचारो को बदलकर । उसे अपनी संस्कृति को समझाकर उसे उसका महत्व उसकी महत्ता, प्रायोगिकता समझाकर ।
इसके लिए बौद्धिक तार्किक वैचारिक बाधाएं आती हैं तो उसके लिए शास्त्र आवश्यक हैं कि हमारी संस्कृति का रक्षण क्यों महत्वपूर्ण है यह समझने के लिए ।
दूसरा, यदि संस्कृति रक्षण के लिए बाधाए ऐसी आती है जहां शास्त्र मीमांसा काम नहीं आती तो वहाँ क्षात्र तेज बल की मीमांसा काम आती है । तब शस्त्र के साथ सुसज्जित होकर कुरुक्षेत्र में उतरना होता है । दोनों का अत्यंत महत्त्व है । 

अब जरा गौर करें आधुनिक समय में होने वाली गतिविधियों की 

संस्कृति पर प्रत्येक दिशा से आक्रमण हो रहे है । इसकी तरफ एक दृष्टि डाली जाये तो एक तरफ मदर टेरेसा और पोप के द्वारा निर्धारित स्वघोषित संत तथा जाकिर  नाइक जैसे लोग हैं जो शास्त्र मीमांसा के आधार पर धर्मं परिवर्तन कर रहे है लोगो को यह बताकर कि उनका वाद श्रेष्ठ है और उनसे इन्हें क्या लाभ मिलेगा आदि आदि मायाजाल बताकर ।
अब इस मोर्चे पर शास्त्र मीमांसा की आवश्यकता और यहाँ शास्त्र ही शस्त्र का काम करेगी। विचारो का युद्ध होगा क्योकि मनुष्य तब तक नहीं बदला हुआ माना जाता जब तक कि उसके विचारो में व् हृदयगत भावनाओ में परिवर्तन नहीं आता । यह महत्वपूर्ण है और इसके लिए प्रयास अवश्य हिने चाहिए। जमीनी स्तर पर यह कार्य होने चाहिए कि सामान्य से सामान्य स्तर के लोगों को ये धूर्त लोग न बहका सकें । जैसा कि प्राचीन ऋषियो ने किया था जैसा कि पूज्य दादाजी श्री श्री पांडुरंग शास्त्री आठवले जी ने अपनी कृति ऋषिस्मरण व् विजिगीषु जीवनवाद में इस तथ्यों को अद्भुत रूप से वर्णित किया है । वैसा ही जमीनी कार्य करना होगा । वैचारिक क्रान्ति लानी होगी । हम कलम से ही करेगे लोगो के सर कलम। 
Adi Guru Shankaracharya
अब दुसरे तरफ है अकबरुद्दीन ओवैसी अलाउद्दीन ख़िलजी गजनी का मुहम्मद बख्त्यार ख़िलजी के वंशज । जो शास्त्र संस्कृति को शस्त्र के बल पर जला देते है । संस्कृति पुरुषो को शास्त्र मीमांसकों को मारते है । सामान्य जान को काटते है । संस्कृति के प्रत्येक स्तम्भ को तोड़ देने के लिए आमादा है । टीपू सुलतान हैदर अली जैसे लोग हैं जिन्होने टोपी या तलवार जैसे नारे लगाए । अकबर जिसे अपना इतिहास महान बताता है उसके प्रशंसक लेखक विन्सेंट स्मिथ उसकी प्रशंसा में लिखता है कि वह जिस गाँव से गुजरता था हिंदुओ के सर के ढेर लगाता चलता था । बख्त्यार ख़िलजी जिसने शास्त्र शिक्षा के केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय को जला डाला । 
ऐसे लोगो के शस्त्रधारी श्रीराम , चक्रधारी श्रीकृष्ण , गांडीवधारि अर्जुनो की आवश्यकता होती है । शस्त्र बाल क्षात्र तेज की यहां अत्यंत आवश्यकता है। चतुर्वेद के साथ धनुर्वेद की यहां आवश्यकता है। अगर ऐसे मौके पर शास्त्र सिद्धांतो की बात किया जाए तो श्रीकृष्ण कहते हैं क्लैब्यम मा स्म गम पार्थ, युद्ध करो की आज्ञा देते हैं । 
 

आज के समय में यह दोनों ही की आवश्यकता है । इसलिए प्रत्येक को इन दोनों के लिए सम्पूर्ण रूप से तैयार रहना चाहिये। 

बन्दा वैरागी की तरह माला और भाला दोनों से सुसज्जित होगा । दोनों का ही प्रयोग संस्कृति रक्षण के लिए करना होगा । जब जहां जिसकी आवश्यकता हुई उसका तात्कालिक प्रयोग वहाँ किया जाए ।
दोनों रास्ते में ही संग्राम करना होगा ।
संग्राम जिंदगी है लड़ना उसे पड़ेगा।
जो लड़ नहीं सकेगा आगे नही बढ़ेगा।
ये राह नही है फूलो की कांटे ही इसपर मिलते हैं ।
ले दर्द जमाने का इसपर तो बस हिम्मतवाले चलते हैं ।
अब कोई हमारे समक्ष किसी सीता का अपहरण कर रहा होगा तो उसे पितामह भीष्म की तरह शास्त्र मीमांसा करके स्वयं को संतुष्ट थोड़े न करेंगे वहाँ तो जटायु की तरह दो दो हाथ करेंगे फिर परिणाम चाहे कोई हो श्रीराम की गोद में मृत्यु तो सुनिश्चित है न।
परंतु श्रीकृष्ण की तरह अंतिम प्रयास भी करना चाहिए और उसी कृष्ण की तरह फिर बाद में अर्जुन के मोह का भंग भी करने वाला विचार भी हो और अलग से साथ ही साथ विचार क्रांति की दीर्घकालिक प्रयासों को भी करते रहा जाना चाहिए ।

विवेकसम्मत समन्वय आज की मांग है ।

इसका मतलब यह नहीं कि हर वक्त हाथ में तलवार लेकर घुमा जाए और यह भी मतलब नही कि जहां प्रत्यक्ष वीभत्स राक्षसी कृत्य आँखों के सामने घटित हो रहा हो वहाँ भक्ति की आड़ लेकर निकल लिया जाए। दोनों को विवेकपूर्ण प्रयोग आज के समय की मांग है ।

अपने ऊपर इन दोनों में से किसी एक का इतना एकांगी आधिक्य न होने पाये कि हम भी नृशंस या बिलकुल कायर बन जाए ।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने शस्त्र धारण कर संस्कृति रुपी सीता की रक्षा व् पुनर्स्थापना की और भगवान् आदि गुरु शंकराचार्य ने शास्त्र धारण करके ।

Chandan Priyadarshi

Chandan Priyadarshi

A student of Spirituality from the ancient city of Nalanda, a Vedantic by faith, an independent philosopher and wanna be philanthropreneur by interest just trying to explore the subtle world of Ancient Philosophy with reference to Modern Science. Having an immense ineterest in Ancient Indian and Vedic Philosophy, Philology, Lexicography, Comparative Religion, Comparative Philosophy, Oriental and Occidental Philosophy, Astrophysics and Astronomy, Ancient and Modern History, Parapsychology, just want to project an integral and synthesized approach of Ancient Philosophy and Modern science to world.

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